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  • 2 days ago

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00:02नमस्कार मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक
00:10विद्या वाचसपती गुलाम कुठारी जी का शरीर ही ब्रह्मान श्रिंख्ला में पत्रिकायन में प्रकाशित आलेख जिसक
00:29और मन दोनों का अधिष्ठाता चंद्रमा ही है जैसे अन्न की अनेक श्रेणिया है वैसे ही मन के स्वरूप भी
00:36होते हैं हमारे अध्यात्म के चार अंग है शरीर मन बुद्धी और आत्मा सबका अपना अपना अन होता है अन्न
00:44सौम्य होता है जिसकी भोगता अगनी में आह�
00:48इसी प्रक्रिया का नाम यगय है प्रतेक यगय से नया निर्मान होता है पन्चागनी का सिधान्त यजियa प्रक्रिया का विस्तार
00:57समझाता है आपास्ट से वायू अग्नी जणि पृत्वी ही। यग्य से बनते हैं यथा ब्रंभ हण्डे त पिंडे के अनुसार
01:05अध्यात्
01:06Shri Shri Shri Kake Kareyo Kake Siddhan aek Jaisae Hi Ho Ta Gaye Some Ki Aahutti Se Aathwene Ishtar Par
01:13Naya Nirmahan Nay Srishti Ho Ta
01:16Hai Jaisae Jal Se Butt-Butt, Phen, Adi Se Hirañya Ka Nirmahan Ho Ta Hai, Shukr Se Bindu, Phen, Kalal,
01:23Shishu, Shari R Pada Ho Ta Ho Ta Hai,
01:25बीज से प्रित्वी में भी अंकुर आधी आठवे इस्तर पर फल लगता है
01:30अनकी जब वैश्वारनर में आखुती लगती है तब रस बनता है
01:34रख्त मानसाधी अश्ट धातों निर्मित होती है अंत में शुक्र बनता है
01:39अर्ध नारिश्वर के सिध्धांत के अनुसार
01:42पुरुष बाहर आग्नेया हैं भी तर सौम्य हैं इस्ति जब पुरुष में आखुत होती है तब भी निर्मान आठवे इस्तर
01:52पर ही होगा
01:53सर्वप्रथम तो सौम अग्नी में चलकर स्वयाम अग्नी बन जाता है
01:58Then the end of it's innate
01:59Our rejection of shake-step intensity
02:02So the breakdown of rising
02:04R chloride
02:05We will have an opportunity
02:06My emotionaluki
02:06Do the breakdown of saving
02:09From unique arran,'s
02:12To Elisha
02:24E Yeawak
02:26As I tell you
02:26Is
02:26Correct
02:26He
02:27और एहेंक्रिती भी बंती है लिफा में जो अश्ठधा अप्रा प्रक्रती है उसी का निर्मान्ण होता है भुमिरापो नलो वायू
02:35?हम
02:36मनोग धि रेमचा अहंकार इतियम में भिन्णाप्रकरति रष्ठधा रसात्मक MirGo Monka निर्मान होता हैe
02:43ुस्त्री पुरुष्ट दोनों के मन चंद्रमा के सोम से बनते हैं, दोनों शद्धा सूत्र में एकाकार होकर आनंद को उपलब्द
02:52होते हैं।
02:53अन्ड के भीतर ब्रम्म रहता है, इसमें देव और असुरप्रान दोनों साथ ही रहते हैं।
02:59स्थ्री और पुरुष दोनों के मन में जैसे विचार रहते हैं, वैसा ही अन्न का स्वरूप हो जाता है, वैसा
03:07ही नय मन का निर्मान होता है, वैसा ही संतान का मन बनता है, हम सब सूर्य की संताने हैं.
03:13देव・αςुर-प्राण भी यहीं से उत्पَन्न होते हैं
03:16अन्न में भी दोनों साथ रहते हैं
03:19जिस प्राण की प्रबलता रहती है वैसा ही मन बन जाता है
03:23सोम ही अन्न है, भouse का विरल रूप सोम है
03:26भouse में शरकरा और सनेहन रहते हैं
03:35ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
04:08ॐ ॐ ॐ
04:35ॐ ॐ ॐ
04:46ॐ ॐ ॐ ॐ
04:53ॐ ॐ ॐ
04:58ॐ ॐ
05:05ॐ ॐ ॐ ॐ
05:19ॐ ॐ
05:25ॐ ॐ ॐ
05:36ॐ ॐ
05:44ॐ ॐ
05:54ॐ
05:59ॐ ॐ
06:28ॐ ॐ
06:59ॐ ॐ
07:29ॐ
07:31ॐ
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07:44ॐ
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07:56ॐ ॐ

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