00:28नमस्कार
00:35पोशी का है, जन्मदात्री है, मा निर्मात्री है, संतती की भी और अपने वर की भी. संतति को श्रेश्टरुतम तरीके
00:44से घड्टी है. गर्भस्त जीव को संस्कारों की शिक्षा से पकाती है, जैसे कच्ची मिट्टी का भांड बना कर कुम्भुकार
00:52उसे भट्टी में तपा
00:53foreign
01:37।
01:42Putser Haiya Putserai, Dotserai, Dotserai Parajas, Shambhi, Bajorsai, Dotshaai, Nambha,ewa.
01:45So, the 누구 has to be seen in the Adhan university of Dr. Bh太ja, Dotserai, and Dotserai, Naand, Desi, Alamakar,
01:48and anfuraketa?
01:50Keeper Tata Dotserai, Dotserai, Dotserai, and Desi, Ayat,ajai, Nambha, and Anand, Desi, Light, and Gonda.
02:11ुपुत्र को पढ़ाई में अवल देखना चाहती है, ताकि आत्म निर्भर बनकर आजीवी को पारजन कर सके, साथ ही उसको
02:19घर के छिटपुट कार्यों से भी जोड़ती है,
02:22पुत्र का पालन पोषन मा अलग रीती से करती है, उसके जन्म के साथ ही वह उसको किसी अन्य घर
02:29के लिए तैयार करती है, उसके प्रती अनन्यस नहभाव होते हिमोई भी, पुत्री को एक अनुशासन में रखना अपना परम
02:37दायित्व मानती है, ग्रहकार्यों में निपुर्�
02:51ुश्यान देती है उससे विविद्पूजा विधानों को करवाती भी है।
02:54बच्पन से ही उसमें एक सुहर ग्रहनी बनने के बीज बोती है ताकि यथा समय वे पुष्पित पल्लवित होकर उसके
03:03वैवाहिक जीवन को सुखमें बना सके।
03:06मा पुत्री को शिक्षित भी करना चाहती है। कभी जरूरत पड़े तो वह अक्षम न महसूस करें। अपना और अपने
03:14बच्चों का पेट भर सके। व्यावसाइक शिक्षा है तू प्रेजित नहीं करती। वह जानती है कि यदि एक मा घर
03:21से बाहर जाती है अर्जन के लिए �
03:23तो वह कभी संसकारवान संताने नहीं दे सके। सत्यरती की मा अपनी पुत्री को क्या इह सीक दे पाई कि
03:31तुम राजमाता ही बनना। इह सीक पितादवारा दी गई। तब उस्ते प्रण किया कि बाबा ने यदि उसे राजरानी बनाना
03:39चाहा है तो अब वह राजरानी भी �
04:05ुदारता की मूर्ती होती है।
04:12आपने यह भी सुन रखा होगा कि नारी वासना भी है और माया भी।
04:43अपना अधिकार त्यागने के स्थान पर अधिकारों के लिए लड़ मरे।
04:47महा भारत की मिनाशकून परिणाम के मूल में बुद्धी मती नारी ही है।
04:52सत्यवती की सत्ता लोग की भावना को मूर्थ रूप देने वाला उसका पिता था।
04:58आज भी हम देखें तो पुत्री को करियर में जोडता पिता ही है।
05:03वर्तमान धोतिक्तावादी युग में अर्थ की प्रथानता है।
05:06ऐसे में पती-पत्नी दोनों का अर्जन आवश्यक हो जाता है।
05:10यह इस्थिती मूलतह मध्यम वर्गिय परिवारों में अधिक देखी जाती है।
05:15उनका जीवन युद्ध भूमी ही हैं जहां नित नई चुनावतियां आती है।
05:20ऐसे में कभी-कभी अभाव पूर्ण जीवन भी जीना पड़ जाता है।
05:25हालंकि अभाव होता नहीं है, किन्तो अभाव अपेक्षा अभाव निर्मित करता है।
05:30वर्ना कत्येक इस्थेती में सुक्से जिया जा सकता है।
05:34इसलिए पिता चाहता है कि पुत्र पुत्री दोनों ही अपने पैरों पर खड़े रहें।
05:39माता भी इसमें सहयोग करती है। दोनों संतानों को मात्र इस रूप में तयार करती है कि जैसे धनोबार्जन ही
05:47जीवन का मूल लक्षय हो।
05:48यहां मा की भूमिका यदि संसकार दात्री की होती है तो यह दोनों ही संतानों को पारिवारिक धार्मिक सामाजिक संबंधों
05:57के उचित निर्वहन की शिक्षा भी देती है।
06:00उसका लक्षय पुत्री को एक संस्कारवती बहूपी बनाना होता है जो किसी घर की ग्रिह लक्षमी बनेगी
06:08नमस्कार
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