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  • 5 minutes ago
भावविहीनता विघटनकारी

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00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिगा के प्रधान संपादक
00:10विद्या वाचसपती गुलाव खुठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलेग, जिसका शीर्षक है भाव विहिंता �
00:18विघ्टन कादि, रसो वई सह, रस ही आनंद है, आनंद का भाव मादुरिय से जुड़ा है, मादुरिय भाव सोम में
00:27रहता है, स्नेहन वा शरकरा गुणों से युक्त सोम में जोड़ने की शक्ति रहती है, इसके कारण ही स्रिष्टि स्रिजन
00:35होता है, विप्रीत भाव में �
00:37प्रलेख ही नियती बन जाता है।
00:40अगनी का गुण विश्कलन करना है।
00:43सृष्टी में अगनी और सोम अविनाभूत है।
00:46इसी कारण इस जगत को अगनी सोमात्मकम जगत कहा जाता है।
00:50आधिक्य भाव ही अगनी व सोम रूप पदार्थों के बेद का कारण बनता है।
00:56सृष्टी में ब्रह्म माया, पुरुष प्रक्रती नर नारी सभी अर्धनारिश्वर है।
01:02ब्रह्म पुरुष व नर जहां आगने भाव की प्रधानता के कारण पुरुष है।
01:07वहीं माया, प्रक्रती व नारी सौम्य भाव के कारण इस्त्रियां है।
01:13यानि पुरुष अगनी प्रधान और इस्त्री सोम प्रधान है।
01:17सौम्य इस्त्री मम्ता वातसल्य पोशन व निर्मान के कारण दिव्यस वरूपा है।
01:23astri sūkṣm tattv hai, šarir n�i hai, gopuniya tattv hai,
01:28uski mul bhoumii ka nir mano hai, santa tii yagya mene, pita bieca deta hai, maa akrati dheti hai,
01:35pošan kerti hai, jiwa atma ko sansqaari t karti hai, pati ko phi daampatyya rati se devrati mene,
01:41pratišhthit karti hai, santan, vapaati, dhonaon mein divyagunio ka sanachar karne vavi istri,
01:48आज अपने मूल भाव को भूल बैठी है
01:51परतमान भौतिक वादी जीवन शैली में
01:53जीवन मूल्यों के विघटन से
01:55संस्कृती व संसकारों की भारतिय परंपरा विच्छिन हो गई
02:00पुरुष्व इस्त्री दो की जगह एक ही पहिया बन गए
02:04तब जीवन दत का संतुलन कैसे संभव हो
02:08दोनों ही समान धरातल पर जी रहें
02:10उनके जीवन का मूल उद्देश्य भोग रह गया
02:14यह सब शिक्षा का कमाल है
02:16जो आज स्कूलों वर कॉलेजों में दी जा रही है
02:21पंचमुखी शिक्षा भारती शिक्षा प्रणाली का एह मिस्सा थी
02:24जो आज मातर व्यवसाय परख हो गई
02:27हर व्यक्ति चाहे पुरुष हो या इस्त्री
02:30करियर की चाह में अंधा बन कर भाग रहा है
02:33क्या हमारे जीवन में यह दोड आवश्यक है
02:36इस बार पर तो विचार ही नहीं किया जाता
02:39तब पुरुष और इस्त्री लड़का और लड़की में भेद कहां रह गया
02:44हम सभी समान रूप से शिक्षित होकर मानव संसाधन बनते चाह रहे हैं
02:50जहां न मन है और ना ही भाव ना है
02:52तब समर्पन, माधुर्यस, नेहन, पोशन, आदर जैसे शब्दों का हमारे जीवन में कोई महत्व नहीं रह जाता
03:01शिक्षित महिला परिवार को यंत्रवत चलाती है
03:04जहां भाव नहीं है मात्र ड्यूटी रहती है
03:07क्रत्रिम भाव जीवन में मिठास नहीं घोल सकते
03:22के दिन को विभाजित करती है
03:24कामकाजी महिला के पास परिवार के लिए समय का अभाव होना निश्यत है
03:29क्योंकि कार्य इस्थल्पन नियर समय पर ही जाना है
03:33ऐसे में तनाव पूर्ण वातावरण में क्या स्वस्थ मन पनप सकता है
03:39इस्त्री का दायित्व घर के प्रती पुरुष से कहीं अधिक होता है
03:42वह प्रक्रती की प्रतिकृती है जो निर्वान वह पोशन से जुड़ी है
03:47यहां निर्मान और पोशन मन का है तन का है
03:50ना कि आर्थिक दृष्टी से संपन बनाने का
03:53TAB KYA ISTRI KKO MAATRI PAKARIYER BANANAY KI SHIKSHYA DEE JANI CHAHAIYE
03:57VAH BHAAVY PATNI HAY BAHU HAY
04:00OR SAB SE BADHKAR VAH MAATRITW PADPAR PRATISHTHIT HONE VAALY HAY
04:04TAB AÁJ KI EHA NAUKARI PARAK SHIKSHYA USE PARIWAR BANANAY KI SEMHJ KAYSAY DAY PAYEGY
04:10ISTRI SHIKSHIT HOGY TOTO PARIWAR BHI SHIKSHIT HOGA
04:13YAH BAAT PILKUL SAHIY HAY KIN TOO
04:15USKI SHIKSHYA MEN POURNDATA AVASHK HAY
04:18महिलाओं के सरवांगین विकास की आधारशिला पंच मुखी SHIKSHYA है
04:23शारिरी खेलकूद, योगासन, आत्मरक्षा के उपाए आधी शारिरी शिक्षा में आते हैं
04:29ग्रहस्ती के कार्य सिलाई, कढ़ाई, क्राफ्ट, सामुहिक्षम कार्य, व्यवहारिक SHIKSHYA है
04:34संगी, नित्य, चित्रकला, आधी कला विश्यक SHIKSHYA है
04:39संसकार, मानविय मूल्यों व कर्तव्यों की बूध परक SHIKSHYA नैतिक है
04:44बौधिक SHIKSHYA में पारंपरिक व आधुनिक विश्यों का उच्च इस्तरिय ज्यान सम्मिलित है
04:50आज, SHIKSHYA से मात्र बौधिक विकास हो रहा है
04:53ऐसे में लड़के व लड़की, दोनों के बुध्धी का विकास समान धरातल पर होता है
04:59मन इसमें जुड़ता ही नहीं, मन के बिना मानव और मानवी, किस स्वरू को प्राक्त हो रहे हैं
05:08यह आज के समाज को देखकर ही समझ आता है
05:11जहां समरस्ता नहीं है, मात्र एक दूसरे को छोटा बनाने का ही उद्देश्य है
05:16लड़के व लड़की दोनों में ही परिवार की समझ नहीं है
05:20परिवारों में संसकारों का महत्व और उद्देश्य समाप्त हो गया
05:25ऐसे परिवेष में पली, बढ़ी, भाव, विहीन इस्त्री ना तो पती का निर्बान कर पायेगी और ना ही संतान को
05:33उचित रूप में संसकारित कर मानव बना पायेगी
05:36प्रतिस परधी भाव में पती के साथ उसके संबंध सकारात्मक नहीं हो सकते
05:42In this regard, the other person also will live in an explanation by the humanliness of humans.
05:48The living human human being will be changed by the human values.
05:53If there is a living woman, then the living woman will be changed by the human created wegens,
06:00the living humans will be changed by the human being.
06:07Namaskar.

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