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شمیم آرا کی برسی کے موقع پر پاکستان کی عظیم فلمی اداکارہ، ہدایتکارہ اور پروڈیوسر کو خراجِ عقیدت پیش کیا جا رہا ہے۔ اس ویڈیو میں شمیم آرا کی زندگی، فلمی سفر، یادگار کردار، کامیاب فلمیں، اعزازات اور پاکستانی سنیما کے لیے ان کی خدمات پر روشنی ڈالی گئی ہے۔


On the death anniversary of Shamim Ara, we pay tribute to one of Pakistan's greatest film actresses, directors, and producers. Discover her remarkable career, iconic films, achievements, and lasting legacy in Pakistan's film industry.

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00:00आईए आज पाकिस्तानी सिनेमा की उस अजीम शक्सियत की बात करते हैं, जिन्होंने वाकिए हमारी फिल्म इंडस्ट्री की बुनियादे रखी,
00:06आज के इस तज्जिये में हम शमीम आरा के उस हैरत अंगेज सफर को समझेंगे, जिसने लॉलीवुट को हमेशा के
00:13लिए बदल
00:13कर रख दिया, तो सीधा मुद्धे पर आते हैं, जरा सोचिए, दुनिया के सबसे बड़े फिल्म फेस्टिवल्स में से एक,
00:19यानि दो हजार चब़ीस का कैन्स फिल्म फेस्टिवल, वहाँ सनम सईद ने किस अजीम हस्ती को खिराजे तैसीन पेश करने
00:26का फैसला किया, जव
00:40का असर शोर मचाने वाला नहीं था, बलकिर बुन्यादी था, यहां ये सवाल जरूर जहन में आता है, कि आखिर
00:47एक खातून ने किस तरह इतनी खामोशी से, लेकिन एक चटानों जैसी मजबूती के साथ, पाकिस्तान की फिल्म इंडस्ट्री की
00:54बुन्यादे रग दी, चलि
01:07की अपनी जिन्दगी किसी फिल्म से कम नहीं थी, 1938 में अलीगड में पैदा होने वाली पुतली बाई, 1950 की
01:14दिहाई के वुस्त में कराची अपने रिष्टेदारों से मिलने आती हैं, और बस यहीं की होकर रह जाती हैं, 50
01:20की दिहाई के आखिर में फिल्म कुमवारी बेवा से
01:23डेब्यू किया, खेर वो फिल्म तो बॉक्स आफिस पर कोई खास जादू न जगा सकी, लेकिन फिर 1960 में आने
01:28वाली फिल्म सहेली ने सब कुछ बदल कर रख दिया, यही वो ब्रेक्थ्रू था जिसने उन्हें रातो रात एक सूपर
01:34स्टार बना दिया, स्क्रीन पर उनकी क�
01:51जबर्दस सलाहितों के पूरी करा मोतरिफ थे, अब आते हैं इस कहानी के सबसे दिल्चस्प हिस्से की तरफ, रीडिफाइनिंग दो
01:58फीमेल लीट, यानि महज एक साइट कैरेक्टर से कहीं आगे की दास्तान, इस फर्क को समझना बहुत जुरूरी है, शमी
02:06मारा के आने से �
02:07पहले लॉलिवुड में खवातीन को आम तौर पर बहुत ही महदूद वन डायमेंशनल किरदारों में दिखाया जाता था, यानि बस
02:14हीरो की महबत बनकर उसके गिर्द घूमना, लेकिन शमी मारा ने इस पूरे निरेटिफ को ही उलट दिया, उन्होंने खवातीन
02:34को कहानी का
02:35पर देख लीजे, 1960 की सहली में उन्होंने फीमिल फ्रेंशिप को कहानी का असल मरकज बनाया, फिर 1964 की ऐसा
02:43भी होता है में रोजमर्रा के जमीनी और जजबाती मसाइल को उभारा, और 1967 की दोहराया में उनका किरदार किसी
02:51साथी रोमैंस के बजाए एक शदीद अंदरूनी क�
03:01अच्छा, ये किस्सा वाकी बहुत मज़िदार है, फिल्म सहली के लिए जब अवार्ड कमिटी ने उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रिस का
03:08अवार्ड देना चाहा तो उन्होंने लेने से साफ इंकार कर दिया, उनका मौकिफ बिलकुल वाज़ था, कि भाई मैंने फि
03:24उन्होंने डिरेक्शन की दुनिया में कैसा इनकलाब बर्पा किया, यानि ब्रेकिंग दे डिरेक्टर बेरियर,
03:291970 की ध्याई में उनका कैमरा के पीछे आना एक तरह से तारीख रखम करना था, एक ऐसी इंडस्ट्री जहां
03:37मर्दों का मुकमल कंट्रोल था, वहां उन्होंने ये साबित कर दिखाया, कि खवाती ना सिर्फ पूरे फिल्म सेट को बाखूबी
03:43ऑपरेट कर सकती हैं, बलके कहा
03:45उनकी सुनाने के अंदास को अपनी मर्जी से ढाल भी सकती हैं, उनकी बतौर डिरेक्टर और प्रडूसर काम्याबी का ग्राफ
03:52बहुत शांदार रहा, 1979 में सुल्ताना उनके शुरुवाती डिरेक्टोरियल प्रोजेक्स में से एक थी, फिर 1992 में मिस होंग कॉंग
04:00के साथ उन
04:14ही ताकतवर थी जितनी स्क्रीन के सामने, नबे से ज्यादा फिल्में, ये कोई मामूली नंबर नहीं है, ये अकेला हिंसा
04:22उनके कई देहाईयों पर मुहीत अक्टिंग, डिरेक्टिंग और प्रोडूसिंग के वसी सफर को जाहिर करता है, ये उनकी मेहनत और
04:29अपने काम से स
04:43साइका जैसी हिट फिल्मों के लिए बेस्ट अक्टरस का अवर्ड, फिर 1968 में साइका के ही लिए बतोर प्रोड्यूसर बेस्ट
04:50फिल्म का अवर्ड, और 90's की देहाई में हाथ ही मेरे साथ ही और आखरी मुझरा के लिए बेस्ट डिरेक्टर
04:56के अवर्ड भी जीते, यानि जो
05:13नहीं आगे तक फैलावा था, मिसाल के तौर पर नवे की दाही के आखर में फिल्म पल दो पल के
05:17जरिये उन्होंने अजीम नुसरत फते अली खान सहाब को मेंन स्ट्रीम सिनमा से मतारिफ कराया, इसके लावा फिल्म कैदी में
05:24फैज अहमत फैज की घजल, मुझसे पहली सी म
05:31पाकिस्तान की पहली रंगीन फिल्म नैला का भी मरकजी चहरा थी, अगर हकाइक की रोशनी में उनकी जाती जिन्दगी की
05:36बात करें, तो तारीक बताती है कि उनकी चार शादियां हुई, और बिलाखर स्क्रिप्ट राइटर दुबीर लहसन के साथ उन्हें
05:42एक पायदार र
05:56मुस्तकिल रास्ता छोड़ कर गई हैं, जो किसी की नजर से ओजल नहीं हो सकता, इनके सफर की सचाई इस
06:02एक जुमले में छुपी है, कि जो रास्ता उन्होंने बनाने में मदद की, उस पर आज भी चला जा रहा
06:09है, ये एक जिन्दा मिसाल है, आज जो खवतीन पूर इतिमा
06:26में फिल्मेकर्स हमारे मीडिया को ढाल रही है, या उन सब में हम शमी मारा के उस बन्यादी और इनकलाबी
06:30असर को बाजे तोर पर महसूस नहीं करते, ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसे तारीख आज के दोर से सीधी
06:35गुफतगू कर रही हो, इस मालमाती सफर में हमारे साथ र
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