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00:00Hello, I am at Shweta Tiwari, I am all of you.
00:05Today I will listen to you Rajaasthana Patrika's Pradhan Sampadak,
00:09Vidya Vachas Pati Gulab Kuthaaji Ji's
00:12The body of the body of the body of the body.
00:17The description is Shraddhka Atm-Tatw Shraddha.
00:22The body of the body of the body is a Kedriya-Tatw Shraddha.
00:31The body of the body of the body is a Kedriya-Tatwill,
00:38Hinduism and Lipism.
00:39The body of the body comes followers
00:40The body of the body is a Kedriya flaky,
00:49ुप में मरीची चंद्रमा पर श्रद्धा तथा पार्थिव जल मर कहलाता है।
01:20श्रद्धा के प्रभाव से वह स्वयम गुरू से बन गया।
01:23अब गुरू की कोई भी निंदा करें, शिश्य इससे कभी प्रभावित नहीं होगा।
01:28गुरुष का स्वरू उसी श्रद्धा से बना हुआ है।
01:35दोनों के आत्मा अभिन हो जाते हैं, तम यथा यथो पासते तथाईव भवती मुद्गल उपनिशन।
01:42गीता भी इसी को स्पष्ट करती हैं, सत्वान रूपा सर्वस्य श्रद्धा भवती भारत, श्रद्धा मयोयम पुरुशोयो यद श्रद्धस एवसह।
01:52इसी शद्धा से सोम, सोम से वर्षा, वर्षा से अन, अन से शुक्र, शुक्र से संतान होती हैं।
02:00चंद्रमा पर संचित इसी जल से पितर त्रिप्त होते हैं, रिगवेद में कहा गया है कि पितर सौम्य हैं, पित्रह
02:08सौम्यासह, पित्रों का संबंध सोम से हैं, देवताओं का संबंध अगनी से हैं, स्वयमभु में रिशी प्रान रहता है, इस
02:16रिशी प्रान से परमेश्�
02:52ुपितर प्राणों से देव प्राणों का विकास होता है।
03:08इसलिए इन तीनों के प्रती हमारा रिण है।
03:35मनुष्य का आत्मा सोम प्रधान होने से सत्य भाव से चुत रहता है।
03:40देवताओं का आत्मा सत्य अगनी के कारण सत्य भाव से युक्त रहता है।
03:45पितरों और देवों के अनुग्रह से जीवन यात्रा यधावत चलती है।
03:50अत्येव उनके प्राकृतिक कार्यों के अनुरूप मनुष्य भी देव वित्रों की त्रिप्ती हित्व तथा अगनी और सोम के संतुलन के
03:59लिए विभिन रित्वों में श्राद्ध यग्य आधी करते हैं।
04:03यह देवों तथा मनुष्यों का परस्पर भावन है, सहयोग है।
04:33सूक्ष्म शरीर धारंकर जो पुरुश चंद्र लोक में चला जाता है, उसका सम्बंध अपने पुत्र से बना रहता है।
04:40पुत्र में पिता का ही श्रद्धा रस आता है। इसी श्रद्धा सुत्र से चंद्र लोक जाते हुए प्राणी को सोममे
04:47तंदुलों अर्था चावल से बने पिंडदान से अन्न पहुचा दिया जाता है। अतह इस कर्म को श्राध कहते हैं।
04:55सूर्य पिंड में रहने वाले अमरत प्राण को इंद्र कहते हैं। अमावस्या को चोकी चंद्रमा इंद्र के साथ रहता है।
05:03असमिन दिव से चंद्रमा इंद्रेन अमासह वसती अतह यह दिन अमावस्या कहलाया। सूर्य चंद्रमा की योग की कारण इसे तर्श
05:12भी कहते हैं
05:13जिस दिन पृत्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है, उस दिन चंद्रमा का प्रकाशित भाग हमारी ओर रहता
05:21है।
05:21यही पूर्णीमा है, पूर्णीमा में देव प्राण की सत्ता रहती है, शुक्लपक्ष की अश्ट्मी देवों का प्राद्ध काल, पूर्णीमा मध्यान,
05:29क्रिशनाश्ट्मी सायं काल है, अमावस्य अर्धरात्री है।
05:34इसके विपरीत कृष्ण पक्ष की अश्टमी पित्रों का प्रातह अमावस्या मध्यान शुक्लाश्टमी सायंकाल कथा पूर्णीमा अर्धरात्री है।
05:43हमारे अनुपात में 30 दिन का समय पित्रों का एक दिन है।
05:47हमारा अहो रात्र 24 घंटे का होता है।
05:50चंद्रमा को दक्ष वृत्त के परिभ्रमन में एक मास लगता है।
05:55अतह पित्रों का अहो रात्र 30 दिन का हुआ।
05:58किन्तु पित्रों के अनुपात से तो वह एक ही अहो रात्र है।
06:02अतह हर माह श्राध उनके लिए तो देनिक हो जाता है।
06:06हमारा निर्मान आधी दैविक, अगनी, रुद्र, विष्णू, आधित्य, अश्विनी, कुमार, मित्रा, वरुन, इंद्र, तवश्टा, पूशा, आधी प्राण देवताओं से होता
06:16है।
06:17सब में देवता रहते हैं मात्रा और प्रम भेद से इस कारण पदार्थों में भिंगता रहती है।
06:24शरीर का जो देवता कम हो जाता है वह उसी देवता प्रधान आश्विधी से स्वस्त होता है।
06:37ुपुवास के माध्यम से कई प्राण देवताओं की कमी को पूरा किया जाता है।
06:42ुपुवास से प्राण सीधा आत्मा में पहुँचकर एक प्रकार का अतिशय पैदा कर देता है।
06:50अतिशय आधान के लिए ही उपुवास किया जाता है। वनस्पति और ओशिधी में सोम की प्रचुर मात्रा रहती है।
06:58यही कारण है कि वनस्पति और ओशिधी देवताओं को आकरिष्ट करती है।
07:04सोम देवताओं का अन है अमावस्या को यजमान अन्शन व्रत करेगा तो अशनाया सूत्र से आकरशित पितर प्राण इसके आत्मा
07:13में प्रविष्ट हो जाएगा।
07:15यदि कुछ भी नहीं खाया जाता तो शरीर का वैश्वानर अगनी मंद पढ़ जाता है।
07:20अगनी मंद होते ही शिदय से भूख पैदा होती है। इसी बल के द्वारा अन लाया जाता है। शरीर की
07:28अगनी में आहुत होता है।
07:30अन के अभाव में यह बल प्रत्रती में व्याप्त प्राण को खीच कर आत्मा से जोड देता है।
07:37शिवरात्री में सांब सदाशिव प्राण, एकादशी को विश्नु प्राण, शरद पूर्णी मा को अश्वीनी नफ्षत्र का प्राण व्याप्त रहता हैं
07:45संपून प्रक्रती में।
07:47गणेश चतुर्थी को रुद्र पुत्र की सब्ता रहती है।
07:50इन प्राणों को आत्म साथ करने के लिए ही इन दिनों में उपवास किया जाता है।
07:55वे प्राण देवता आकरशित होकर आत्मा में बस जाते हैं।
08:01अमावस्या को पितर प्राण पून रूप से पृत्वी पर व्याप्त रहते हैं।
08:05यदि अमावस्या में व्यक्ति कुछ नहीं खाता हैं, तो सरवत्र व्याप्त पितर प्राण इसके आत्मा से संबंध बना लेता है।
08:13उसका अंशन, कर्म, पित्री देवत्ते हो जाता है।
08:17भोजन करने से आगने प्राण बढ़कर सोम प्राणों की सत्ता को रोग देते हैं।
08:22पितर प्राणों की सत्ता को अत्ह व्यक्ति को वही वस्तु खानी चाहिए जो देवता न खाते हूं।
08:28अर्थात वनोशधी और फल। इनमें सोम अल्ब मात्रा में रहता है अत्ह उनका देवताओं से सम्मंध भी नहीं रहता।
08:36प्रत्येक माह की अमावस्या को नित्य शाध काल की रूप में माना जाता है।
08:41इस शाध को पारवन शाध कहा जाता है।
08:44आश्विन कृष्ण अमावस्या सर्व पित्री अमावस्या कहलाती है।
08:48यही शाध पक्षित पित्रों के तरपण का मुख्यकाल माना गया है।
08:53मान्यता है कि इस दिन पित्री अपने वन्षजों के समीब आते हैं।
08:58अन्य और चल से त्रिप्त होकर वे वन्षजों को सुक सम्रुधी का आशिरबात देकर लोड़ जाते हैं।
09:04श्रद्धा शाध की आत्मा है।
09:06शाध का संपून, विधान, अर्थात, पिंडदान, तरपण, ब्रामन, भुजन तभी सार्थक होता है जब वह श्रद्धास, नेह, संकल्प और प्रित्रग्यता
09:16से अनुप्रानित होता है।
09:18नमस्कार

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