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  • 7 months ago
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Transcript
00:01It was about 9.00 a.m.
00:17It's about 9.00am.
00:33एक ही passenger बाकी है अरे conductor अभी कितने passenger बाकी है जी उस्ताद अब बस एक ही passenger बाकी
00:43है और ये आखिरी passenger कहाँ पर उत्रेगा पता नहीं उस्ताद रुकिए मैं उसी से पूछ कराता हूँ
00:51तभी conductor धीरे धीरे उस passenger की और बढ़ने लगता है
01:03अरे ओ लड़के उठ जा
01:07अपने कानों से headphone निकाल
01:10क्या हो गया चाचा
01:12तुने बस का टिकेट लिया था?
01:15हाँ लिया था टिकेट वो अभी भी मेरी जेब में बड़ा है आपको चाहिए क्या?
01:20नहीं नहीं अच्छा ये बताओ ये टिकेट कहा जाने का लिया था?
01:25चायापुर जाने का?
01:27क्यों चाचा क्या बात है?
01:29क्या? ये तुम क्या बोल रहे हो?
01:32तुम्हें चायापुर में उतरना था
01:34और तु यहां कानों में headphone लगा कर सो रहा था
01:37ये गाव तो कबका एक घंटे पहले ही निकल चुका है?
01:40क्या कह रहे हो जाचा? चायापुर गाव निकल चुका है
01:45पैसेंजर तुरंथ खड़ा हो जाता है
01:48और आसपास की खिड़कियों के बाहर देखने लगता है
01:54ये क्या कर दिया जाचा?
01:56जब चायापुर आया था तो आपको बोलना चाहिए था न?
02:00अरे हम बोले होंगे तुम सुना ही नहीं होगा
02:03तो हम क्या करें? और headphone लगा कर सो जाओ
02:07जब तुम यात्रा करने निकलते हो तो क्यों सो जाते हो?
02:12हम चायापुर से काफी दूर निकल आये हैं
02:15और अभी ये बस काली घाटी के घने जंगल में है
02:18अब बोलो क्या करोगे? आगे की ओर जाओगे? या यही काली घाटी में उतरोगे?
02:25अरे चाचा आगे की ओर जाएंगे तो वहाँ से वापस आने के लिए मेरे पास पैसे नहीं है
02:29एक काम कीजे चाचा बस को रुखवा दीजिए
02:34मेरे पास साइकल है हम साइकल से ही वापस चाया पुड चले जाएंगे
02:39ठीक है अपना रिस्क लेकर उतरना
02:42क्योंकि पिछले दस सालों से मैंने कभी भी इस काली घाटी के जंगल में बस नहीं रोकी है
02:48तो मेरी यही राय है कि इस जंगल में मत उतरो
02:52अगले बस स्टेशन पर रुखकर सुबह होते ही वहाँ से निकल जाना
02:56वैसे भी तुम्हारे पास साइकल भी है
02:59अरे चाचा अगर सिर्फ साइकल होती तो मैं अगले बस स्टेशन पर उतर जाता
03:04लेकिन मेरे पास किताबों और कॉपियों से भरी एक पोरी भी है
03:09उसे साइकल से खींचते खींचते मेरी हालत बहुत खराब हो जाएगी
03:13ठीक है तुम्हारी मर्जी मैं बस रुकवा देता हूँ
03:17फिर कंड़क्टर ड्राइवर के पास जाने लगता है
03:21अरे ड्राइवर साब बस रोक दीजी
03:26तभी ड्राइवर काली घाटी के घने जंगल के बीचों बीच
03:30अपनी बस धीरे धीरे रोक देता है
03:36क्या हो गया कंड़क्टर बस अचानक क्यों रुकवाया
03:41अरे उस्ताद एक बहुत बड़ी प्रॉब्लम हो गई है
03:44बस में जो एक पैसेंजर बैठा है उसे चायापुर में ही उतरना था
03:49लेकिन वो पैसेंजर कानों में हेड़फोन लगाए गहरी नींद में सो रहा था
03:54और वो पैसेंजर अभी जिद कर रहा है कि मुझे इसी काली घाट के जंगल में ही उतर दीजिए
04:00ये तुम क्या कह रहे हो कंडक्टर तुम्हें तो सबको एक एक करके पूछना चाहिए था ना
04:06अगर इस पैसेंजर को इस काली घाटी में उतरने के बाद कुछ हो गया तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा
04:13तो अब हमक्या करें उस्ताद इसमें गलती मेरी थोड़ी ना है
04:19मैंने तो सबको चिलाकर कह दिया था कि छाया पुर बस आ गया है
04:23अगर वही कानों में हेड़फोन लगाकर सो जाए तो इसमें मेरी गलती थोड़ी ना है
04:28ठीक है ठीक है इन सब बातों का भी कोई मतलब नहीं है
04:32अगर ये passenger यहीं उतरना चाता है
04:35तो इसका phone number लेकर इसे यहीं छोड़ दो
04:38सुबह call करके पूछ लेना कि घर पहुंचाया नहीं
04:42ठीक है उस्ताद ले लेता हूँ phone number
04:45तो फिर conductor उस आखिरी passenger से उसका phone number ले लेता है
04:50और धीरे धीरे उसका सारा सामान बस से नीचे उतार देता है
04:55passenger चुप चाप सामान संभालता रहता है
04:59कुछ ही पलों बाद बस के दर्वाजे बंध होते हैं
05:03और बस आगे की ओर बढ़ जाती है
05:09और वह passenger काली घाटी के जंगल में अकेला खड़ा रह जाता है
05:27आसपास के जानवरों की आवाजें उस काली घाटी के जंगल को और भी भयानक बना रही होती है
05:34कहीं दूर से सियारों की आवाज आती है
05:37तो कहीं कहीं उल्लू की डरावनी गून जुटती है
05:41जिससे पूरा माहौल और ज्यादा सिहरन भरा लगने लगता है
05:45मैं कितना आलसी हो गया हूँ
05:48पस में कब आँखें लग गई मुझे पता ही नहीं चला
05:51अब इस किताबों से भरी बोरी को साइकल से खीचना पड़ेगा
05:58मेरी मा ठीक ही बोल रही थी
06:00कि शाम को रूम खाली मत करो
06:03लेकिन मैंने सुना ही नहीं
06:05अगर मा की बाते सुन लेता तो इस सुनसान रोड पर नहीं फस्ता
06:10चलो कम से कम मेरे पास साइकल तो है
06:13रात भर में गाउं पहुँच ही जाएंगे
06:16इतना कहकर राजू अपनी साइकल के पीछे बोरी रख देता है
06:21और पैदल ही अपने गाउंफ की ओर लोट पड़ता है
06:25दरासल राजू पिछले छे वर्षों से पटना में रहकर
06:30सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था
06:33उसकी तैयारी अब पूरी तरह से हो चुकी थी
06:37वह जिस भी सरकारी परीक्षा में बैठता
06:41उसमें सफल हो जाता
06:43लेकिन किसी न किसी कारण से हर बार
06:46चैन से वंचित रह जाता
06:49कभी फिजिकल टेस्ट में
06:51कभी आयू सीमा में
06:53तो कभी मेरिट के आधार पर
06:55इन लगातार सफलताओं के बाद
06:59राजू ने यह निरने लिया
07:01कि अब आगे की तैयारी
07:04वह घर से ही करेगा
07:05क्योंकि वह एक किसान परिवार से आता है
07:08और परिवार की जिम्मेदारियां भी उस पर थी
07:12तभी अचानक राजू साइकल रोक देता है
07:18और पीछे मुड़ कर देखने लगता है
07:24पीछे सननाटे के सिवा
07:26उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था
07:30राजू को देखकर ऐसा लग रहा था
07:33मानो वह किसी चीज की तलाश में हो
07:37फिर वह अपने शरीर को चेक करने लगता है
07:41सीट यार
07:43चल्दी चल्दी में मैं अपना बैग बस में ही भूल गया
07:46उसी बैग में मेरे मैटरेक और इंटर के सारे जरूरी दस्तावेस थे
07:50और मोबाइल का चार्जर भी
07:52उपर से फोन की बैटरी भी खत्म हो चुकी है
07:55लगता है सफर के दौरान
07:57मुझसे कोई न कोई गलती हो ही जाती है
08:00पहले नींद लग गई तो रास्ता छूट गया
08:03और अब इस हडबड़ी में बस में ही बैग भूल बैठा
08:07आज किस्मत भी जैसे मेरा साथ नहीं दे रही
08:12बस का नंबर भी मुझे याद नहीं है
08:14अब इस बस को आखिर ढूटें तो कैसे
08:18अगर वह बैग नहीं मिला
08:20तो मेरी जिंदगी भी बरबाद हो जाएगी
08:23समझ में नहीं आ रहा कि अब क्या करूँ
08:26बस की और वापस जाओं या घर की तरफ
08:28मैं बहुत पड़ी समस्या में फंस कया हूँ
08:32राजू हर तरफ से फंस चुका था
08:35एक तो अंधेरी रात में पैदल घर तक जाने की मजबूरी
08:40और दूसरी ओर बस में अपना बैग छूट जाने की चिंता
08:45इनहीं उल्जे विचारों में डूबा हुआ राजू
08:49आखिरकार घर की ओर चल पड़ता है
08:52हे भगवान सच में मेरी किस्मत बहुत ही खराब है
08:56एक तरफ इतने सालों की महनत के बाद भी
09:00नौकरी के चैन में बार बार अणचने आ रही है
09:03और दूसरी ओर मेरे सारे जरूरी दस्तावेजों से भरा
09:07बैग पस में ही छूट गया
09:09उनी कागर्जों पर मेरा भविश्य टिका हुआ था
09:13उपर से अब मैं संधेरी और सुनसान सडक पर अकेला फंसा हुआ हूँ
09:18कुछ समझ में नहीं आ रहा है
09:20आगे क्या करूँ
09:22बस में छूटे हुए बैग के बारे में सोचते सोचते
09:26राजू उस अंधेरे रास्ते पर धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था
09:31काली घाट के सुनसान रोड पर उसकी हालत पूरी तरह बिगड़ चुकी थी
09:38आसपास से आ रही अलग-अलग जानवरों की डरावनी आवाजें सुनकर
09:42उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगता है
09:46कुछ देर चलने के बाद राजू अचानक फिर से रुक जाता है
09:51अरे हाँ, उस कंड़क्टर ने तो मेरा मोबाइल नमबर भी लिया था
09:56अगर उसका कॉल आ गया, तो शायद मेरा बैग भी मिल जाएगा
10:02कम से कम अंजाने में ही सही, एक काम तो ठीक हुआ है
10:06अब किसी भी तरह इस सुनसान काली घाट के रोड से निकलना होगा
10:10यह बोरी इतनी भारी है कि साइकल चलाना भी मुमकिन नहीं है
10:15ठकान बढ़ती जा रही है लेकिन अब रुकना नहीं है
10:18धीरे धीरे ही सही, चलते रहेंगे
10:21आखिरकार घर पहुँच ही जाएंगे
10:29राजू के चेहरे पर बैग मिलने की हलकी सी उमीद झलकने लगती है
10:34उसके मन में यह भरोसा लगने लगता है
10:38कि कंडक्टर का कॉल जरूर आएगा
10:41और उसका बैग उसे वापस मिल ही जाएगा
10:45उसी बैग में उसके भविश्य से जुड़े सारे जरूरी कागस थे
10:50इसी उमीद के सहारे उसकी थकान कुछ कम होने लगती है
10:56और वह मन ही मन खुद को संभालता हुआ
11:00अपने घर की ओर तेजी से कदम बढ़ा देता है
11:04मानो हर कदम उसे राहत के थोड़ा करीब ले जा रहा हो
11:10चलते चलते राजू एक बार आस्मान की और नजर उठा कर देखता है
11:19लगता है आज बारिश होने वाली है
11:22हे प्रफू मेरी रक्षा करना
11:26आस्मान की और नजर उठाते ही साफ महसूस हो रहा था
11:31कि आज बारिश जरूर होने वाली है
11:35उपर काले घने बादल छाय हुए थे
11:38जो बार बार गड़ गड़ा कर अपने आने का संकेत दे रहे थे
11:46रह रह कर बिजली की हलकी चमक अंधेरे को चीर जाती थी
11:51मानो प्रकृति भी उस सुनसान रास्ते पर चल रहे
11:56राजू की बेचैनी को गहरा कर रही हो
12:02चलते चलते अचानक राजू की साइकिल पर लदी बोरी नीचे गिर जाती है
12:09साइकिल हलका होते ही वह पीछे मुड़ कर देखने लगता है
12:14और तुरंद रुख जाता है
12:19सामने जमीन पर पड़ी बोरी को देखकर वह चौक जाता है
12:25ये बोरी नीचे अपने आप कैसे गिर गई?
12:30राजू आसपास नजर दोड़ाता है
12:33लेकिन वहां दूर दूर तक सनाटे के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता
12:41जब राजू साइकिल के पीछे ध्यान से देखता है
12:44तो उसे वहां बंधी हुई रस्सी तूटी हुई दिखाई पड़ती है
12:49अच्छा रस्सी तूट गई है
12:51अब मैं रस्सी कहां से लाऊं?
12:54बिना रस्सी के इस बोरी को आखिर कैसे बांधूँ?
12:57तब ही राजू आसपास नजर दोड़ाता है
13:00उसे पास ही एक जोपड़ी दिखाई देती है
13:04शायद वहां कोई जोपड़ी है
13:06जाकर देखता हूँ
13:07क्या पता वहां से बांधने के लिए कुछ मिल जाए?
13:11इस सुनसान रास्ते में और कोई सहारा भी तो नहीं है
13:15उम्मीद है कोई मदद मिल जाए
13:18तब ही राजू सब कुछ छोड़ चाड़ कर
13:20उस घर की ओर धीरे धीरे बढ़ने लगता है
13:24उसके मन में बस यही उम्मीद होती है
13:27कि शायद वहां बोरी बांधने के लिए
13:30कोई रसी या काम आने वाली चीज मिल जाए
13:35सुनसान रास्ते और अंधेरे माहौल के बीच
13:38वही घर उसे एक मात्र सहारा नजर आता है
13:41इसलिए वह हलकी घबराहट के साथ भी
13:44हिम्मत जुटा कर उसकी और कदम बढ़ा देता है
14:04जोपड़ी का दर्वाजा खुला देखकर
14:06राजू उसके अंदर जाने लगता है
14:11उस घर के अंदर
14:12उसे अपने जैसी ही एक साइकल रखी हुई दिखाई देती है
14:16लेकिन असली हैरानी तो तब होती है
14:19जब वह देखता है
14:21कि उस साइकल के बगल में एक बोरी भी रखी हुई है
14:26जो बिलकुल उसकी बोरी जैसी ही लग रही थी
14:28अरे ये तु बिलकुल मेरी साइकल और बोरी जैसी ही दिख रही है
14:32ऐसा कैसे हो सकता है
14:35शायद ये महज एक इत्तफाग भी हो सकता है
14:38तभी पीछे से अचानक एक आवाद सुनाई देती है
14:45तभी राजू धीरे धीरे पीछे मुड़कर देखता है
14:50जैसे ही उसकी नजर सामने पड़ती है
14:52वह सन रह जाता है
14:55जो दरिश्य उसके सामने होता है
14:57उसे देख कर उसके पैरों तले जमीन खेसक जाती है
15:01और उसकी सांसें ठमसी जाती है
15:07अरे, मैं ये क्या देख रहा हूँ?
15:09ये तो मेरी ही तस्वीर है
15:10मेरा फोटो इस दीवार पर क्यों टंगा हुआ है, ऐसा कैसे हो सकता है
15:15दीवार पर अपनी ही तस्वीर देखकर राजु घबरा जाता है
15:20जैसे ही उसकी नजर नीचे टेबल पर पड़े कैलेंडर पर पड़ती है
15:25उसकी हालत और भी खराब हो जाती है
15:28कारण यह था कि उस कैलेंडर में आज की तारीख नहीं
15:32बलकि पचास साल बाद की, यानी दो हजार छेहत्तर की तारीख अंकित थी
15:40ऐसे कैसे हो सकता है
15:42डाइरेक्ट पचास साल आगे मैं यहां कैसे पहुँच गया हूँ
15:45यहां का हर सामान, हर चीज मेरे जैसी क्यों है
15:49जैसे ही राजू सामने की कुरसी पर रखे कपड़ों को हटाता है
15:54उसके सामने का दृष्य देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती है
15:59उस कुरसी पर एक कंकाल बैठा होता है
16:02और वह कंकाल बिलकुल उसी तरह का कपड़ा पहने होता है जैसा राजू ने पहना था
16:08यह सब देखकर राजू का शरीर काँप उठता है
16:12डर और घबराहत में वह सब सामान वहीं छोड़ छाड़ कर तुरंट वहां से भाग जाता है
16:26Kaffi dayr tak bhaagnay ke baawajud, raju phir usi ghar ke sámenne pahunch kar ruk jata hai.
16:32Uske shariir mein abhi darr ki hal chal hai,
16:35lekin lagta hai,
16:37jiasse koji adrishya shakti usse vahin rok raha ho.
16:40Har taraf sannaata hai,
16:42aur anadhera khana.
16:43Aur aisa mehsus hota hai,
16:45ki koji chalawa, koji adrishya chaya usse pukad hi liya hai.
16:51Raju phir se dårnene ki košish kerta hai.
16:55Is barvaha apne darr or ghabrahat ko pichhe chhoedtay huwe,
16:58kafi tezhi se bhaagta hai.
17:01Har kدم ke sath uski dharkan tez hoti jati hai.
17:04Aur aisa lagta hai,
17:05ki jiasse har minit,
17:07har second kisi adrishya khatrhe se bچnene ki dår hai.
17:10Uske pair zameen ko zore se thap thapate hai.
17:15Is bar dårtate dårtate raju ka pair lard khada jata hai.
17:20Vah santhulan khu bäđtta hai.
17:22Aur raastate meh pade,
17:23eek bade pander se tukra kar,
17:25moho ke bal zameen par gir pade ta hai.
17:28Tard ke karen,
17:29vah zore zore se chilla uchta hai.
17:36Arre kya huwa?
17:37Itna chilla kiyo rhe ho?
17:39Mä bas me huu,
17:40aur mera pair?
17:42Haan,
17:42tum abhi bas me huu.
17:44Chhaayapur pahunc gae hai.
17:45Tumhye utarna hai to utar jau.
17:47Thik hai, thik hai.
17:49Abhi níche utar raha ho.
17:58Raju chhaayapur meh bas se níche utar jata hai.
18:03Lekin uske man mein bhai nye aisa sthahan bana liya tha.
18:06Uski halat puri kharab ho chukyi hoti hai.
18:10Thang god.
18:11Oopar walay ka ashirwaad hai ki mein thik hunk.
18:14Abse yatra kertate samei mein kabhi bhi horror video nahi däkhoun ga.

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