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00:00प्रव एक्रिवार से को बड़ा Darul
00:30झाल झाल
01:00झाल झाल
01:30जोतिर्गमय, मृत्योर्मा मृतंगमय
01:38सर्वे इपि सुखिन संतु, सर्वे संतु निरामया
01:52सर्वे भत्राणि पश्चन्तु, मा कश्चित दुख्ध भाधवे
02:01जो हो शान्ति ही, अंतरिक्ष शान्ति ही, पुथि विशान्ति ही, आप शान्ति ही
02:21ऐफ शधय शांति ही, वनस्पतय स्चान्ति ही, विश्वे देवाइश शान्ति ही, कामस शान्ति ही,
02:38प्रोध शांति भे राम्हस शांति ही सर्वस शांति ही शांति रेव शांति ही साभस शांति रेधी
03:00यतो यत समीह सेत तो नूम भयं कुरू
03:08शन्न पुरु प्रजाव्यो भयन पशुप्या
03:15सुच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्�
03:45झाल झाल
04:15झाज पुफट
04:19पुछ दुछ
04:23पिंआ
04:28पिंआ
04:31सुंद
04:33लाक
04:35यद
04:37प्रिप
04:39पिंआ
04:41फजय करो
05:11कर दो कर दो झार को लुट झार को लोग्स
05:41कि अगया जोरोन कि यह उपर है नहीं आमात्य तो क्या सम्राट का ऐसा अदेश है कि मगत के आमात्यों के लिए मगत के नियम ताक पर धर दी जाये नहीं आमात्य तो आपने नकर दवार खोलने की अनुमत क्यों दी
06:09मैंने विचार किया कि आपने विचार किया कि मुझे प्राता की प्रतिक्षा में कश्ठ हो
06:16मेरे पद और मेरी पीडा से मगत की सुरक्षा आतुलनिय है
06:21इसमरन रहे मगत समराट के जीवन से भी मगत की सुरक्षा महत्वपून है
06:28स्वाइम सम्राट भी मगत की सुरक्षा के नियमों का उलंगन नहीं कर सकते हैं
06:33मैं चाहूंगा कि इस खटना की सूचना तद काल नगरा धक्ष को दे दी जाए जो आगया मत
06:40कि डाउपा ऑन लुचके ठाइम स्वार मारी, क Renee B
06:52कह फिस 차 कि क्उल में तद खटNS
06:56यह si तौसे मारी, कर 10 अनल लार्ग्या क्वाइम
07:01क्वाइमा तौसे और भी मारी ।
07:07तर दो किहा है।
07:37जान सभा में भाग लेने आये हुए सभीष नातक वा ब्रह्मचारी अंतख पाल को अपिक्यान मुद्रा दिखा सीधे नगर में प्रवेश कर सकते हैं
08:07सार्थवा शी ग्री सुलका ध्यक्ये समख्चु बश्तेद हों
08:37जान स्थुलका ध्यक्यान मुद्रा दिखा प्रवेश हों
08:57आपस्ट, आपके रिखए meशने आपके पार नहीं गारे को बाहसे है को एम वाले है को आपके, आपके पारे, किए भाले है आपके यहासे हो पारे को लेख खिए में एम आपके मे RS
09:22स्नातक तुमारे अभिज्ञान मुद्रा
09:28तुमारा परिचय पत्रा
09:35विश्ण कुप्तर तक्षिला निवासी हो
09:50अब जा सकते हो
10:20अब जा सकते हो
10:50झाल झाल
11:20झाल
11:50पागल हो गया क्या? तुम बोलता क्यों ने?
12:18तेरे पती को धुननन्द की सिपाई उठा लेगा
12:21मुझे तुछ पर विश्वास नहीं हो रहा है विश्णू
12:25सत्य बड़ा कथोर होता है मा
12:28पर तेरे पिता जिवित भी तो हो सकते हैं
12:32तू भी ब्रह्मे जीना चाहती है
12:33उसी ब्रह्मे जिसमें तेरा पती जीता था
12:48परेके पश्यात आप वित्र भी पवित्र हो जाता है
12:50तू अपने भीतर साधना की अगनी को जन्म देना
12:54जलना ज्यान की साधना में जलना
12:58सूरज ना सही दीपक तो जलूर बनना
13:01अज़ो
13:02अज़ो
13:12वर्ष्यों से कभी नगर तवार तो
13:42कभी पाटले पुत्र की विध्यों में विष्णु को ढूट रहा हूं अब तूटने लगाओं मन बार बार आशंग के थोड़ता है और हर बार मन को समझाता हूं कि विष्णु अभी जीवित है उसका सुमरण करते ही मन भीग जाता है पर मुझे ये दंक्यों मिल रहा है क्यो
14:12विष्वास नहीं रहा मुझे सहायता कर पाटली पुत्र छोड़ने का आतेश नहीं है मुझे कहां ढूनू विष्णु को उसकी प्रतीक्षना होती तो अब तक इस जीवन का भी त्याग कर दिया होता
14:42जहां भी है विष्णु फेजदे उसे फेजदे एक बार सिर्फ एक बार उसे एक बार देख लूँ तो फिर आसानी से अपने प्रान त्याग सकता हूं
15:12कि महाराथ चंदर गुपत की जाया हो
15:33इससका प्राद क्या है
15:39इसमें परणाट के नागरिकों पराक्रम बनकर उन्हें लूटने का प्रयास किया है
15:43नागरिक क्या तुम्हें अपना प्राच विकर है
15:47मैंने बोजू महराज
15:51छूत मत बोलो नागरिक
15:52यदि किसी पर भी अन्याय हुआ तो पाप का भगी मैं हूँगा
15:56महराज इसमा कर दे शमा कर दे नागरिक प्रजा के जिवन वा संपति की रक्षा करा मेरा प्रथम कर्तव्य है
16:02अधा तुम्हें शमा नहीं क्या जा सकता
16:05मंत्रिवर ये एक मास के लिए कारावास में डाल दिया जाए
16:08और राजन ये मगट का नहीं अभी तुमालव जनपत का नागरिक है अतो इसे और कड़ा दन दिया जाए
16:15मंत्रिवर अपनी माबा को भंग मत करो मेरे राज में कोई मगट कोई मालव कोई विच्छी कोई पांचाल नहीं कोई कुरू कोई लिच्छवी नहीं
16:24मेरे सामराज्य में जनप्रदों की सीमाय मानों को बात नहीं सकती
16:28धर्म की ववस्ता मानों को काट नहीं सकती
16:31मेरे द्रिश्ट में सभी एक हैं, सभी भारतिय हैं
16:35याद रहे भविश्य में पुहाँ
16:37अलगाओं की प्रवृत्ति को कोशन करने वाल बातों को न्यायले में पुना न उठाए जाए
16:42आज की सबाई यही विसर्जित होती है
16:44समराट की जय हो
16:46चिजहन के राजन अलगाओं की भावना तो भिन्नी pork preट में बुठी है राजन उसे कैसे दूर जासकता है
17:04सीमा रिखा मानाtar मुझाल यही तो खीषता है राजन अलगाओं की भावना उसके मस्तिष्क से उखाड़ फेकना है पर वह कैसे संभो है
17:14अभी तो मैं अज्ञानी हूं देव पर वी नहीं हो
17:17क्या नाम तुमारा चंद्रगुप्त
17:20और तुमारे आचारे का
17:39मैंने उनसे बहुत कहा कि मैं उन्तिये द्वार दूर बैठके ही पाटों को सुनुगा पर हर जगा मुझे अपमान हीमला
17:47मैं इतिहास की पुन्रावर्त्य नहीं होने दूगा एक लब्य चंद्रगुप्त तु अपने साथ बहुत सारी संभावनाय लाया है
17:54मैं उन्स संभावनाओं को नस्ट नहीं होने दूगा आज से तेरा अचार्य मैं हूँ
18:00उत्थेस्ट भारत हु चंद्रगुप्त मेरी माता मुझे पकार रही है मैं आपसे कल में लूँगा
18:08मैं बंदागार में ठहा रहा हूँ चंद्रगुप्त
18:12अरी ओम गनानात्वा गनपति ग्वंग अवा महे प्रियानात्वा प्रिया पति ग्वंग
18:40प्रिया पति ग्वंग
18:50अवामारी नी इननन आ्निती पतिग वंग
18:55अवामारी न rulerम अम्जा नीर्वत्त अव्त
19:00प्रुनेंदू, देखो बाहर, अमात्य रक्षिस मेरी आज्या की प्रतीक्षा कर नहें, उन्हें आदर पूर्व किना लियाओ?
19:30यह भी बड़ा हठी है, नहीं मानेगा
20:00अध्या कर दो मानेगा, यह भी बाहर, अव्या ट्यास, यह भी बड़ा की आवा है, यह भी आवाज है।
20:30झाल झाल
21:00अब तुम सब विश्राम करो
21:20किसी दिन मैं तुम्हारा घोर अपाई
21:30अपमान करूंगा तब तुम यहान अबंद करोगे
21:35दुष्टों की रक्षा करने वालों को क्या आशिरवाद दूँ
21:51हायूश्मान भवा
21:54मैं जानता था तुम आओगे
21:58तुम अपना करम नहीं बदलोगे और मैं अपना
22:01मौन क्यों हों आमात्य
22:07आप मगत को इतना बड़ा दंड क्यों दे रहे हैं
22:11आमात्य
22:13इसी प्रकार प्रतेक वर्ष्टों मुझे शब्दों से रिज्धाने का प्रयास करते हो
22:18और मैं एक ही उत्तर देता हूं
22:21फिर भी मुझे तुमसे दो बातें करना अच्छा लगता है
22:25मगत के प्रती तुम्हारी निष्ठा के कारण ही तुम मुझे प्रये हो
22:31अन्यता
22:33मैं दोष्टों की रक्षा करने वाले क्या मंगल की काम ना करता
22:37फिर तुझे सुझाव देता हूं
22:42छोड़ दो नंद परिवार को दुष्टों की सेवा करने से कभी तुम्हारा भी घोर अपमान होगा
22:51अमात्य
22:54हां आरे
22:55मगत में कोई भूखा तो नहीं जायता है ना
22:58नहीं आरे
22:59इस्त्रियों, शिशोवा, निदोष्जनों की रक्षा तो होती है ना
23:03हां आरे
23:04ब्रह्मचारियों को भिक्षा तो मिलती है ना
23:06हां आरे
23:07मगत के आचारे अपने दायत्यों का निर्वा ठीक से तो कर पा रहे है ना
23:11हां आरे
23:13नागरिकों को उपास्टन की सोतंत्रता है
23:16हां आरे
23:17नागरिकों का चरित्र एवं आजरन शुद्ध है
23:21सम्राट का आचरान शुद है
23:25आरे कल ग्यान सबह में आये
23:29तो मुझे आती प्रसन्नता होगी
23:32तुम मुझे पुरा प्रसन्न हो लो आमाते
23:35पर मैं जहां नंद हो वहां नहीं आउंगा
23:41आरे हो
23:41बस अब और तर्क नहीं
23:43तुम यूही बैठे रहो मौन
23:46तुम बोलोगे तो मैं फ्रोदित होँगा
23:51कश्ट हो रहा है आमाते
23:58नहीं आरे
24:01जाओ
24:02घर जाओ
24:04सुनो आमाते
24:16मगत को संभालना
24:20अध्यान में रहे
24:22किसी विद्वान का नंद के हाथों अपमान ना हो
24:34तुम अध्यान है तेरी माता आमाते
24:41तेरी निष्ठा के आगे पैपिनत्मस्त को जाता हूँ
24:47है
24:50है
24:56है
25:00है
25:01है
25:02है
25:03कर दो कर दो कर दो
25:33कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर दो कर �
26:03प्रिक तकालिट
26:21कि अ बपक इनो में, बपक किस ऐ।
26:27करो दो
26:28करो
26:32प्रणाम अमातर प्रणाम कैसी प्रगति है सुमाल्या की पाश और अपनी बाई और कुमार थोड़ा व्यर्फ प्रहार करते हैं अन्य था प्रगति संतोष्प्रद है काल जाई कुमार को लेकर राजभवन पहुंचे जो आगे
26:48हुआ है
27:18कि अज बैंने कुछं और लागस से बाला झेला है
27:48अब खारी नहां से जुर्णार जार्णी खारी जहां.
28:06जाला, मैं कार्यी.
28:12जाला, मैं ये चारी है.
28:18एक कंटक ने मुझे आहत किया था इसलिए इन्हें समून नस्ट कर रहा हूं वो पीड़ा हुई होगी अधत्ति अगनी पर दोड़ सकता हूं पर किसी निर्दोष को यह आहत कर सके या मैं नहीं सब सकता कार्टो से भी कही गुना अधिक पीड़ादाई वस्तु हैं और भी त
28:48चंद्रगुप्त इस मठे के करण थोड़ी देर में चीटियों के जूंद के जूंद यहां आएंगे और यह समस्त कंटक समून नस्ट हो जाएंगे चलो
28:57अचारी क्या ज्यान सभा में नहीं जाएंगे आज तो हम बुद्धियों शक्ति का समन्वेव होनेवाला है अब अश्च जाओंगा
29:11कर दो
29:15कर दो
29:19कर दो
29:27झाल झाल
29:57झाल झाल
30:27महाराजाय प्रसय साइने नमुवयं वैस्तवणाय कुर्मय
30:35समे कामान काम कामाय मैयं
30:41कामेच्वरो वैस्तवणो दधातू
30:45कुवे आया वैस्तवणाय महाराजाय नमा
30:52मारुवातारि दायाते मादुच्चारंते सेंदावा
31:05माद्वे नासंतो सदी मादुनक्त मुतो कासो
31:14मादुमत्पार्थिवग्वंग्रजाह मादुर्णोरस्टूनापिता
31:21मरुमानो बडस्पति मरुमान अस्तु सुर्या माद्विर्णावो भवंधुनाप्
31:35नमस्ते रुद्रमन्या वाउतो दैसवे नमा दावुव्यामुतती नमा
31:53याते रुद्रसिवातनूरगूरा पापकासिने तयानस्तन्वासंतमयागिसंता विचाकसि
32:09ओर बनस्त्तност्री नमस्ते रुद्र्णागकास्टूर्गूर्णा वित्रसिवे मुद्र्णाःूर्णाठ्ष्दूर्णाप्तूर्णापकर्ष्दूर्णापकर्तिük
32:21आस्याजादा पतिरेका आसित सदाहार प्रितविन्या मुवे माम कर्मेदेवा यह विशावि देमा
32:51महामात्य परिक्षा का समय निकट आ रहा है और अभी तक महाराज घननंद वामात्य वर्ग का आगमन नहीं हुआ
33:07मैं अभी देखता हूं
33:09अचारिया
33:24मा भारती वा मा सरवसदी तुम्हारा कल्यान करें
33:36लोगारां
34:04लोग और आंग आज तुम भी दस सहस्त्र कार्शापन हार गये
34:09तुम लोगों का खेल समाप्त हो गया
34:13क्यों कोई है मगद में जो धननंद को पराजित कर सके
34:19प्रणाम देव
34:36आओ आमात्यों कैसे हैं तुम्हारे ये साथी एक भी ढंग से चलना नहीं जानते हैं
34:45और इस विचक्षना और इसकी सक्षियों को देखो ये चतुरंग के खेल में मुझ पर विजय पाना चाहती है
34:52जबकि मैं इससे कहता हूं कि मैं इसके सम्मुक हार चुका हूं
34:57महराज ग्यानसभा में दूसरे जनपत से आय हुए सभी सनातक विद्वान वह मगत के नागरिक आपकी प्रिशना कर रहे हैं
35:05फिर वही ग्यानसभा फिर तुम वहाँ नीतियों की बात करोगे और वे सनातक नीतियों के खोकले अदर्शों को मुझ पर थोपने का प्रयास करेंगे
35:15और जो सनातक सबसे अधिक श्रेष्ट जीवन मूल्यों परंपराओं और विचारों को वैभार मिलाने की बात करेगा उसे तुम मगत के राजकुल के किसी बड़े पद पर आसीन कर दोगे बस जाओ उनसे तुम ही निप्टों और महाराज से पहले आप सब को सभाभावन मे
35:45चलिए महाराज से पता नहीं क्यों तुम्हारे आगे मैं विवश हो जाता हूं अहां बाते हूं
36:01आई दे
36:05कर दो
36:35कर दो
37:05कर दो
37:07कर दो
37:11कर दो
37:15आप
37:17रूम
37:23स्वाष्टे लड़ें दो प्रेज्ड़ाष्णावा
37:29स्वाष्टे लड़ें
37:33स्वास्तिनस्तारिच्छो परिष्टनेवि स्वास्तिनों प्रिलस्परिदादातू
37:46आज भिख्षुकों की तो भीर लगी है महामात्य
38:04मैं वेदों को साक्षी मान कर इस ज्ञान सभा में विभिन जन्पदों से आए
38:14स्नात्कों से प्रश्ण करना प्रारंब कर रहा हूँ
38:17मैं आलोक काशी जन्पद का निवासी आचारिय पिनाक पानी का शिष्य सभा को प्रणाम करता हूँ
38:32धर्म और अर्थ का स्त्रोत क्या है धर्म और अर्थ का स्त्रोत राज्य है
38:39प्रमान
38:41नमोस्तु राज्य वृक्षाया, सटगुन्याया प्रसाखिने, सभादी चारू पुन्याया, त्रिवर्ग फल्दाईने
38:49राज्य का मूल क्या है?
38:51राज्य का मूल राजा है
38:54राजा, मंत्री परिशद, सेना पती, सैनिक, प्रजा और देश का परसपर सम्मंध क्या है?
39:02राजा राज्यरूपी व्रिक्ष का मुल है
39:08मंत्री परिसद उसका धड़ है
39:10सेनापती उसकी साखाए है
39:13सैनिक उसके पल्लव है
39:16प्रजा उसके पुष्प है
39:18देश की संपन्नता उसके फल है
39:22और समस्त देश उसका बीज है
39:25साधो, साधो, साधो
39:28दूसरों पर विजय पाने की अपेक्षा
39:31किस पर विजय प्राप्त करना राजा के लिए परमा आवश्यक है
39:34अतर काम, क्रोध, लोब, मान, मद और हर्स के त्याग से
39:45इंद्रियों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए
39:47क्या मैं इंद्रिय जई नहीं हूँ
39:50मुझसे ही किसी राजपदत्वा कार्शापणों की भीक्या पेक्षा रखने वाले
40:01तुम मेरे प्रशन का उत्तर क्यों नहीं देते
40:04किसी मैं सहस है मेरे प्रशन के उत्तर देने का
40:09नाम अगनिवेश जन्पत तक्षशिला अचार्य
40:31तक्षशिला का गुरुकुल आचार्य वरुडुची ने भी तक्षशिला के गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की है
40:49सबसे बड़ा शत्रु अहंकार दिर्धन का धन विद्या कि सत्पुरुष कौन है यो परोपकार के लिए आगे बढ़े वही सत्पुरुष है
41:02स्त्री का अभूशन लज्जा सबसे बड़ा वीर कौन है दानवीर जो सब कुछ लुटा दे वह दानवीर और जो लूट रहे हैं वह ज्यानी
41:17धन की रक्षा किस से करनी चाहिए धन की रक्षा चोरों राजपुर्शों से करनी चाहिए
41:23सुख का मूल धर्म है धर्म का मूल अर्थ है अर्थ का मूल राज्य है राज्य का मूल इंद्रिय जय है इंद्रिय जय का मूल विनय है विनय का मूल विद्धों की सेवा है
41:42कि राजा का हित किस में है राजा का हित प्रजा के हित में होता है यानि मैं प्रजा का अहित करूं तो मेरा भी
41:53हां तो क्या तुम्हारे शास्त्रों के आगे मेरा सामर्थ है कुछ भी नहीं
42:10कि नहीं कौन कहता है सामर्थ ही शास्त्रों को जीवित रखता है मोर्क
42:14कि भोलो क्या है तुम्हारे शास्त्रों की द्रिश्टी में मेरी स्थिती एक वेतन भोगी सेवक से बढ़कर कुछ नहीं तो मैं यहां बैठे लोगों का सेवक हूं उत्तर दे मौर्ख
42:29ओ तो अब इसकी बारी है ब्रह्मार्ण तू नहीं मांगेगा भीक्षा लूट ले इन शठों के साथ तू भी लूट ले धननंद को
42:47क्यों ब्रह्मार्ण तू शास्त्रों की चर्चा नहीं करेगा किसी राजपद अथ्वा धन के लिए धननंद के आगे हाथ नहीं पसारेगा मेरा धन ग्यान है धननंद और मेरे ग्यान में शक्ति रही तो मैं अपना पोशन कर सकने वाले सम्राटों का निर्मान कर लूँगा
43:17और इतना हंकार सिक्षक साधारण नहीं होता धननंद प्रयव निर्मान दोनों उसकी गोद में खेलते हैं तो क्यूं आया था तू यहाँ
43:25सोचा था पाटली कुत्र में ग्यान के प्रगाश कुद देखूंगा पर देख रहाओं कि ग्यान के सूर्य को राहू ग्रस रहा है तो वो राहू मैं हूँ निकालो इस ब्राहमन को यहां से मैं कुत्ता नहीं हो था नुननन जिस स्वामी की ठोकरे खाने के बाद भी उसके �
43:55कल तेरा दृतिय जनमा होगा चंदर भुप्त अभयं ज्यावा प्रितिवी इहास्तू नो भयं सो मह सवितानकृणोतू
44:13अभयं नोस्तुर्वंतरिक्षम सब्तरुषीनाम् चह विषाभयं नो अस्तू अभयं ज्यावा प्रितिवी इहास्तू नो भयं सो मह सवितानकृणोतू
44:31अभयं नोस्तुर्वंतरिक्षम सब्तरुषीनाम् चह विषाभयं नो अस्तू अभयं ज्यावा प्रितिवी इहास्तू नो भयं सो मह सवितानकृणोतू
44:47अभयं नोस्तुर्वंतरिक्षम सब्तरुषीनाम् चह विषाभयं नो अस्तू अभयं ज्यावा प्रितिवी इहास्तू नो भयं सो मह सवितानकृणोतू
45:04अभयं नोस्तुर्वंतरिक्षम सब्तरुषीनाम् चह विषाभयं नो अस्तू अभयं ज्यावा प्रितिवी इहास्तू नो भयं सो मह सवितानकृणोतू
45:21अभयं नोस्तुर्वंतरिक्षम सब्तरुषीनाम्
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